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ग्रास साप्ताहिक, निर्मल निवास, सपरून, सोलन
(हि.प्र.)
न.-9418104770 |
शिल्ली और सेरी के बीच चली जंग में शिल्ली ने बाजी मारी
सेरी को केवल वार्ड मेम्बर लेकर
संतुष्ट होना पड़ा...
निजी संवाददाता
सोलन :
सोलन नगर से सटी सेरी
पंचायत में सबसे रोचक मुकाबला देखने को मिला जिसमें शिल्ली क्षेत्र ने जबरदस्त
जीत हासिल की। यहां से प्रधान पद के लिए रवनीत सिंह ‘रिंकू’ ने कांग्रेस और
भाजपा समर्थित दोनों प्रत्याशियों को पराजित किया। यहां एक दिलचस्प बात यह
देखने को मिली कि जहां रवनीत कांग्रेस और भाजपा से टक्कर ले रहे थे वहीं वह
शिल्ली और सेरी गांव में फंसी राजनीति को भी साध रहे थे। इस जंग में सैरी को
जहां अपना प्रधान पद गंवाना पड़ा वहीं उपाध्यक्ष पद से भी सेरी को हाथ धोना पड़ा।
कहते हैं कि रावनीत को ग्रामीण संघर्ष समिति का सहयोग
मिला पंचायत के पूर्व प्रधान देवेन्द्र वर्मा ‘काकू’ भी खुलकर रवनीत के प्रचार
में कूद पड़े थे। शिल्ली में ग्रामीण संघर्ष समिति ने ऐसा तानाबाना बुना कि वह
जहां प्रधान पद लेने में सफल हुए वहीं बीडीसी और उप प्रधान पद भी शिल्ली की टीम
की झोली में चले गए। यहां से बीडीसी चुनाव मोहित वर्मा और उपाध्यक्ष पद एडवोकेट
अजय शर्मा की झोली में चला गया। बरसों के लंबे संघर्ष के बाद रबनीत के हाथ
जबरदस्त सफलता लगी।
रवनीत ने जहां भाजपा समर्थित विजय कुमार को पछाड़ा वहीं
कांग्रेस समर्थित राशी सुलतानपुरी को पराजित करने में सफलता प्राप्त की।
एडवोकेट अजय शर्मा ने अपने नाम राशि सेरी के अजय शर्मा को हराया वहीं कामरेड
मोहित वर्मा ने भाजपा समर्थित जगदीश को पराजित किया। सेरी गांव के हाथ सिर्फ एक
वार्ड मेंबर ही आया, जबकि इससे पहले प्रधान पद सेरी गांव के पास ही था। शिल्ली
और सेरी की राजनीति में दोनों छोर एक दूसरे से संतुलन बनाकर चुनाव लड़ते हैं। एक
ओर से जहां प्रधान एक गांव का होता है वहीं उप प्रधान दूसरे गांव को दिया जाता
है।
इस बार भी कांग्रेस और भाजपा के नेताओं ने इसी चाल को चला
लेकिन ग्रामीण संघर्ष समिति के बीच में कूद जाने के बाद यहां पूरा राजनैतिक
परिदृश्य ही बदल गया। पंचायत प्रधान रवनीत सिंह ‘रिंकू’ बीडीसी सदस्य मोहित
वर्मा और एडवोकेट अजय शर्मा ने एक संयुक्त बयान में कहा है कि वह पूरी पंचायत
का धन्यवाद करते हैं। अब राजनीतिक बिसात को मात देने के बाद उनका लक्ष्य बिना
किसी भेदभाव के पूरी पंचायत का सर्वांगिण विकास करवाना है और वह सभी लोगों को
साथ लेकर विकास का नया अध्याय लिखने की ओर अग्रसर हो रहे हैं। तीनों विजेताओं
ने चुनाव परिणाम के बाद जीत का जश्न मनाया। इस जीत पर उन्हें कई लोगों ने
शुभकामनाएं दी हैं।
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कीर्तिमान स्थापित करने से 13 वोट पीछे रह गए रमेश बंसल
वार्ड दो की कड़ी टक्कर में सुषमा ने राजा को हराया...
निजी
संवाददाता
सोलन :
सोलन नगर निगम में इस बार के चुनावों में एक
नया रिकार्ड बनते बनते रह गया। इस रिकार्ड के बनने के बीच सिर्फ 13 वोटों का
अंतर रह गया। यदि वार्ड न. 2 के निर्दलीय प्रत्याशी इस अंतर को पाट जाते तो यह
कीर्तिमान नगर निगम के इतिहास में दर्ज हो जाता कि पहली बार चुनाव में उतरे
किसी निर्दलीय प्रत्याशी ने भाजपा और कांग्रेस के प्रत्याशियों को हराकर नगर
निगम में प्रवेश किया है।
यूं तो नगर निगम सोलन में कई आजाद प्रत्याशी चुनाव जीते
हैं लेकिन वह सभी पहले किसी राजनैतिक दल से संबद्ध होकर पाषर्द बन चुके थे और
उसके बाद उन्होंने आगे के चुनावों में निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर जीत दर्ज
की थी। अब तो नगर निगम के चुनाव राजनैतिक पार्टियों के चुनाव चिन्ह पर हो रहे
हैं। इससे पहले राजनैतिक पार्टियों द्वारा समर्थित प्रत्याशियों का पैनल जारी
करने का रिवाज शुरू हो गया था।
इससे भी पहले 70 के दशक में सोलन के नगर पालिका के चुनाव
होते थे। तब सभी प्रत्याशी आजाद होकर ही चुनाव लड़ते थे। हलांकि चुनाव जीतने के
बाद प्रत्याशी विभिन्न राजनैतिक दलों के पाले में फिट हो जाते थे। वह जमाना ऐसा
था जब पूरी नगर पालिका पर मोहन मीकिंस का कब्जा होता था और अधिकतर उन्हीं से
समर्थन प्राप्त प्रत्याशी चुनाव जीतता था। नगर पालिका के बाद 1994 में सोलन में
नगर परिषद बनी। उसके बाद ही यहां नगर परिषद के चुनावों में राजनीति पूरी तरह से
घुस गई। उसके बाद कोई भी पार्षद पहले ही चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के तौर
पर चुनाव नहीं जीत सका है। इस बार रमेश बंसल को इस रिकार्ड को तोड़ने का मौका
मिला पर वह चूक गए, जबकि वह शुरुआती गणना में बहुत आगे चल रहे थे।
इस चुनाव में भाजपा की सुषमा शर्मा को 791 वोट मिले जबकि
आजाद रमेश बंसल को 778 वोट मिले। अंतिम दौर में वह 13 वोट से चुनाव हार गए और
नगर निगम का यह नया कीर्तिमान बनते बनते रह गया। लोगों ने सुषमा के साथ साथ
राजा को भी इस मुकाबले के लिए बधाई दी है। नगर में इस चुनाव की खासी चरचा है।
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मेयर को लेकर फंसा पेंच
निजी संवाददाता
सोलन : हलांकि भाजपा
नगर निगम सोलन में 10 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत में है लेकिन मेयर किसे
बनाया जाए यह पेंच यहां फंस गया है। भाजपा में जो पुरुष चुनाव जीतकर आए हैं
वह सभी न्यू कमर हैं और महिलाओं में कई महिलाएं पहले भी पार्षद रह चुकी
हैं।
भाजपा को महिला मेयर बनाने में परेशानी यह है कि इस बार
मेयर की सीट आरक्षित नहीं है, किसी पुरुष को मेयर बनाया जाना चाहिए। दूसरी
परेशानी यह है कि पूर्व के नगर निगम में भी मेयर का पद महिला के लिए
आरक्षित था और यदि इस बार भी किसी महिला को मेयर बना दिया गया तो पुरुष की
बारी मेयर बनाने की कब आएगी।
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सस्ती लोकप्रियता बटोरने आते हैं नेता
विधानसभा - लोकसभा चुनाव हैं नेताओं के लिए...
निजी
संवाददाता
सोलन :
प्रदेश के बड़े नेताओं को स्थानीय निकाय और
पंचायत चुनाव में नहीं आना चाहिए। यदि वह फिर भी बाज नहीं आते हैं तो कहा जा
सकता है कि वह सस्ती लोकप्रियता बटोरने के लिए इन छोटे चुनावों में आते हैं।
पहले इन छोटे चुनावों में विधायक स्तर का नेता भी दिखाई नहीं देता था और अब तो
मंत्री और मुख्यमंत्री तक इन चुनावों में उतारे जाते हैं।
हमारे संविधान निर्माता मूर्ख नहीं थे जिन्होंने स्थानीय
निकाय और पंचायत चुनावों को विधायिका से दूर रखा था। इन चुनावों में वह लोग आने
चाहिए जो सरकार की योजनाओं को आम लोगों तक पहुंचाने में मदद करें। इसमें
राजनीति घुसेड़ कर सरकारों ने विकास कार्य पूरी तरह से ठप्प करवा दिए हैं और इन
संस्थाओं में जहां घूसखोरी को चरम पर पहुंचा दिया वहीं इन संस्थाओं को भ्रष्ट
बनाकर रख दिया है।
सरकार को चाहिए कि स्थानीय निकाय और पंचायती राज चुनावों
में जहां खुद को दूर रखे वहीं विभिन्न पार्टी के लोगों को भी इससे दूर रहने को
कहें। नेताओं के लिए भारत के संविधान ने विधानसभा और लोकसभा में खुलकर खेलने के
सारे प्रावधान रखे हैं। जिन्हें राजनीति का शौक है वह बड़े चुनावों में भाग लें
चुनाव जीतें और कानून बनाने की ताकत हांसिल करें फिर चाहे वह देश को बनाएं या
बिगाड़ें।
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